मैं, मुह़ब्बत और तुम!!! तीनों एक ही सिक्के के.... तीन पहलू हैं! तीन??? लेकिन सिक्के में तो.... दो ही पहलू होते हैं!!🤔 वही तो! तीसरा पहलू भी है... जो मुह़ब्बत का है! यह जर्जर है अभी.... इसलिए दिखता नहीं अभी!! ज़रूरत है इसे नई तवानाई की ... जब यह तवाना होगा... इसकी भी अपनी परत होगी... यह भी बा-वजूद होगा!! हमारी और तुम्हारी तरह़!! तब मान लेंगे सब... और तुम भी!!! कि मुह़ब्बत का भी पहलू है... वह भी एक ही सिक्के में... मेरे और तुम्हारे साथ!!! मगर अफ़सोस!! एक साथ रहकर भी,,,,हम दोनों...! मिल न पाएंगे कभी... सिरे जो अलग हैं!! बस मुह़ब्बत रहेगी... कुछ तुम्हारे ह़िस्से... कुछ हमारे ह़िस्से...! बस यही एक वजह होगी... जो एह़सास कराएगी...हमें एक-दूसरे से... जुड़े होने का!! :-©आफ़ाक़ अह़मद "दिलकश" :-
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